आंद्रे यारहम की उम्र सिर्फ 24 साल थी। उसकी क्रिसमस के तुरंत बाद मौत हो गई है। उसकी मौत की वजह डिमेंशिया नामक बीमारी बताई जा रही है। इतनी कम उम्र में इस गंभीर बीमारी से उसकी मौत ने सभी को झकझोर दिया। आमतौर पर यह बुजुर्गों को होने वाली बीमारी है।
आंद्रे की मौत के बाद मां ने उसके दिमाग को मेडिकल रिसर्च के लिए दान कर दिया है ताकि वैज्ञानिक इस दुर्लभ बीमारी को और अच्छे से समझ सकें और भविष्य में किसी और परिवार को ऐसी पीड़ा न झेलनी पड़े।
मिरर यूके की एक रिपोर्ट (ref.) के अनुसार, आंद्रे की बीमारी की शुरुआत गलत पहचान से हुई थी। शुरुआत में डॉक्टरों ने उसे ऑटिज़्म बताया लेकिन उसकी मां सैम फेयरबर्न को यह बात सही नहीं लगी। उन्होंने देखा कि बेटे का बेहवियर धीरे-धीरे बदल रहा था। चलिए इस पूरे मामले को समझते हैं और साथ में यह भी समझते हैं कि इस तरह के मामलों से आपको क्या सबक लेना चाहिए।
आंद्रे में दिख रहे थे अजीब लक्षण
उसकी मां ने बताया कि आंद्रे पहले की तुलना में बहुत कम बोलने लगा था, उसे किसी भी चीज में दिलचस्पी नहीं रहती थी और वह अपनी नौकरी पर जाना भी छोड़ने लगा था। जब मां ने एक्सपर्ट डॉक्टर को दिखाया तो सच्चाई सामने आई।
आंद्रे के 23वें जन्मदिन से ठीक पहले उसका एमआरआई स्कैन किया गया, जिसमें फ्रंटोटेम्पोरल डिमेंशिया की पुष्टि हुई। डॉक्टरों ने बताया कि उसका दिमाग किसी 70 साल के बुज़ुर्ग व्यक्ति जैसा हो चुका था। यह खबर पूरे परिवार के लिए बेहद दुखद और चौंकाने वाली थी।
इस बीमारी के कारण आंद्रे बोलने की क्षमता खो बैठा। उसकी देखभाल के लिए मां सैम को अपनी नौकरी छोड़नी पड़ी और वे उसकी फुल-टाइम केयरगिवर बन गईं। क्रिसमस के दिनों उसकी हालत और ज्यादा बिगड़ गई। डॉक्टरों ने उसे एंड-ऑफ-लाइफ केयर पर रखा और बताया कि उसके पास सिर्फ कुछ हफ्ते ही बचे हैं।
आंद्रे की 27 दिसंबर को नॉर्विच के प्रिसिला बेकन लॉज हॉस्पिस में मौत हो गई। आंद्रे की मां सैम ने बताया कि उसके दिमाग को कैंब्रिज के ऐडनब्रुक्स हॉस्पिटल में रिसर्च के लिए दान किया गया है। उन्होंने कहा कि अगर भविष्य में इससे किसी एक परिवार की भी मदद हो सके, तो यह हमारे लिए बहुत बड़ी बात होगी।
आंद्रे की 27 दिसंबर को नॉर्विच के प्रिसिला बेकन लॉज हॉस्पिस में मौत हो गई। आंद्रे की मां सैम ने बताया कि उसके दिमाग को कैंब्रिज के ऐडनब्रुक्स हॉस्पिटल में रिसर्च के लिए दान किया गया है। उन्होंने कहा कि अगर भविष्य में इससे किसी एक परिवार की भी मदद हो सके, तो यह हमारे लिए बहुत बड़ी बात होगी।
ऑटिज्म में याददाश्त नॉर्मल रहती है और बोलने या लोगों से घुलने-मिलने में दिक्कतें शुरू से होती हैं जबकि डिमेंशिया में शुरुआत में सब ठीक रहता है लेकिन बाद में भूलने की समस्या, बोलने में परेशानी और व्यवहार में बदलाव आने लगते हैं। ऑटिज्म टाइम के साथ बिगड़ता नहीं है और सही थैरेपी व सपोर्ट से व्यक्ति बेहतर कर सकता है, जबकि डिमेंशिया में हालत धीरे-धीरे खराब होती जाती है। दोनों का कोई पक्का इलाज नहीं है।














































