तलाक जीत नहीं, सिर्फ उम्मीदों का अंततलाक का आवेदन मंजूर करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट की टिप्पणी!

PARMODKUMAR

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वैवाहिक विवादों में दोनों पक्षों (पति और पत्नी) के बीच कटु आरोप-प्रत्यारोप के बढ़ते चलन को देखते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि मैट्रिमोनियल केस अक्सर गहरे भावनात्मक जख्म दे जाते हैं। शादी का खत्म होना किसी एक की दूसरे पर जीत नहीं है, बल्कि यह कानूनी मान्यता है कि रिश्ता अब ऐसी जगह पहुंच गया है जहां से वापसी नहीं हो सकती।

कोर्ट ने मंजूर की याचिका

कोर्ट ने यह टिप्पणी मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक के लिए दाखिल एक व्यक्ति के आवेदन को मंजूर करते हुए गुरुवार (20 नवंबर) को की और दोनों पक्षों से अपील की कि वे आगे की सभी कार्यवाहियों और बातचीत में तहजीब बनाए रखें।

पूरी तरह खत्म हो जाती है संभावना

मौजूदा केस के तथ्यों और परिस्थितियों के हवाले से हाई कोर्ट ने कहा कि एक बार जब पति या पत्नी दूसरे पक्ष के करीबी रिश्तेदारों पर सेक्सुअल गलत व्यवहार का आरोप लगाता है, तो शादी के रिश्ते में तालमेल फिर से बनने की संभावना पूरी तरह खत्म हो जाती है।

बेंच ने मामले पर किया गौर

जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस रेणू भटनागर की बेंच ने गौर किया कि मौजूदा मामले में दोनों पक्षों की 2016 में शादी हुई थी और 2020 से वे अलग-अलग रह रहे हैं। उनका रिश्ता उस कगार पर खड़ा है जहां सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है।

अपील करने वाला तलाक का हकदार

हाई कोर्ट ने कहा, ऐसे में उन्हें ऐसे रिश्ते में बंधे रहने के लिए मजबूर करने से आपसी कड़वाहट और मानसिक तकलीफ को बनाए रखने के अलावा कोई मकसद पूरा नहीं होगा। इसलिए, अपील करने वाला (पति पक्ष) तलाक के आदेश का हकदार है।

याचिका को कर दिया खारिज

इस व्यक्ति ने फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ मौजूदा अपील दायर की थी, जिसने हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 के तहत क्रूरता के आधार पर तलाक के लिए दाखिल उसकी याचिका को खारिज कर दिया था। हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले से असहमति जताई जिसका कहना था कि क्रूरता साबित नहीं हुई और, पति पक्ष को साफ मंशा के साथ अदालत में आना चाहिए।

कोर्ट ने फैसले को किया निरस्त

विवादित फैसले को निरस्त करते हुए कोर्ट ने कहा कि पत्नी का व्यवहार, जिसमें यह बताना कि शादी मर्जी के खिलाफ हुई थी, पति (अपीलकर्ता) और उसकी मां के साथ बार-बार गाली-गलौज, आत्महत्या की धमकी, साथ रहने से मना करना, और बेवजह आखिरकार छोड़ देना शामिल है, कुल मिलाकर हिंदू मैरिज एक्ट के सेक्शन 13 (1) (ia) के तहत क्रूरता बनती है।

सबूत के बजाय अंदाजे पर आधारित

कोर्ट ने कहा कि पत्नी पक्ष के दहेज उत्पीड़न और गलत व्यवहार के आरोप बेबुनियाद रहे। पति पक्ष (अपीलकर्ता) के पिता का गवाह के तौर पर हटना, अपने आप में जरूरी तथ्यों को दबाने या हिंदू मैरिज एक्ट के सेक्शन 23 (1) (1) के मतलब में गलत नहीं है। इसलिए, फैमिली कोर्ट का यह मानना कि अपीलकर्ता बदनीयती के साथ कोर्ट आया था, सबूत के बजाय अंदाजे पर आधारित है।