Fever Ayurvedic Treatment: आयुर्वेद में बुखार का सबसे पहला उपाय है लंघन, बॉडी टेंप्रेचर मैनेज करने का तरीका

parmodkumar

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मेरे पास आने वाले बुखार के मरीजों की संख्या अक्सर मौसम में बदलाव के दौरान बढ़ जाती है। यह एक बेहद आम स्वास्थ्य समस्या है, जो हर उम्र के लोगों को प्रभावित करती है। मैं एक आयुर्वेदिक डॉक्टर के रूप में फीवर को मैनेज करने के लिए सबसे पहले लंघन करने की सलाह देती हूं। इसके साथ डाइट और हाइड्रेशन पर ध्यान देना जरूरी है ताकि मरीज जल्दी से जल्दी बेहतर महसूस कर सके।

आयुर्वेद में बुखार को ज्वर और इसके इलाज को ज्वर चिकित्सा कहा जाता है। इसे मैनेज करने के लिए सबसे पहले बीमारी को समझना बहुत जरूरी है। आयुर्वेद कहता है कि अगर एक चिकित्सक बुखार के विकास और समाधान को अच्छी तरह समझता है तो इस बीमारी को आराम से कंट्रोल कर सकता है। बुखार में शारीरिक तापमान बढ़ जाता है, जो इंफेक्शन के प्रति शरीर की पहली प्रतिक्रिया है।

फीवर में अग्नि का ध्यान रखना महत्वपूर्ण

हेल्थ को बनाए रखने के लिए डायजेस्टिव और मेटाबॉलिक फायर का सही रहना बहुत जरूरी है, जिसे आयुर्वेद में अग्नि कहा जाता है। जब अग्नि सही से कार्य करती है तो शारीरिक उत्तकों के लिए पोषण के रूप में खाने का ढंग से परिवर्तन होता है। लेकिन जब यह पाचक अग्नि कमजोर होती है तो ‘अमा (आम, आमा)’ बनता है। यह अधूरा मेटाबॉलाइज्ड सब्सटांस टॉक्सिक होता है। यह विषाक्त पदार्थ पूरे शरीर में घूमकर फिजियोलॉजिकल चैनल को ब्लॉक करता है और टिश्यू का संतुलन बिगाड़ता है, जिसके परिणामस्वरूप इंफ्लामेशन और बीमारी विकसित होती है।

इसलिए बुखार को एक इंफ्लामेटरी और प्रोटेक्टिव रेस्पॉन्स की तरह देखा जाता है। जब भी शरीर में अंदरुनी इंफ्लामेशन या इंफेक्शन होगा, तब-तब शरीर अमा को मेटाबॉलाइज करके अग्नि का संतुलन बनाने के लिए अपना अंदरुनी तापमान बढ़ाएगा। इसी नजरिए से, आयुर्वेद में हल्के बुखार को तुरंत ना दबाने की सलाह दी जाती है।

बुखार के इलाज का पहला आयुर्वेदिक कदम
आयुर्वेदिक फीवर मैनेजमेंट का पहला कदम लंघन है। इसमें अमा को ढंग से मेटाबॉलाइज करने के लिए डायजेस्टिव लोड कम किया जाता है। इसके लिए शारीरिक रूप से मजबूत लोगों को छोटे-छोटे व्रत करने या हल्का, सुपाच्य और गुनगुने तरल पदार्थों का सेवन करने की सलाह दी जाती है। डायजेस्टिव एनर्जी को बचाने के बाद शरीर डिटॉक्सिफिकेशन और हीलिंग पर फोकस कर पाता है। भारत जैसे देश के लिए यह नजरिया बिल्कुल सही है, जहां बुखार के पीछे अक्सर वायरल इंफेक्शन, मौसम में अचानक बदलाव, प्रदूषण का संपर्क, एलर्जी और तनाव, नींद की कमी व अस्वस्थ खानपान जैसी लाइफस्टाइल हैबिट्स देखने को मिलती हैं।

घर पर कैसे करें देखभाल?
बुखार मैनेज करने के लिए घर पर सही देखभाल करना भी आवश्यक है। हर 4 से 6 घंटे के भीतर डिजीटल थर्मोमीटर से बॉडी का टेंप्रेचर चेक करें। बुखार में शारीरिक और मानसिक ऊर्जा कम हो जाती है, इसलिए आराम जरूर करें। पर्याप्त नींद लेने, स्क्रीन का इस्तेमाल कम करने और शांत व वेंटिलेटेड माहौल में रहने से जल्दी रिकवरी होती है। आयुर्वेदिक नजरिए के मुताबिक ऐसी देखभाल से ओजस की रक्षा होती है, जो इम्यूनिटी और जीवनशक्ति का केंद्र माना जाता है।

बुखार में कैसी होनी चाहिए डाइट?

बुखार से जल्दी उबरने के लिए आपकी डाइट और हाइड्रेशन का सपोर्ट बहुत महत्वपूर्ण है। गुनगुना पानी या तुलसी, अदरक, जीरा, धनिया, सौंफ से बना हर्बल काढ़ा घूंट-घूंट करके बार-बार पीएं। इससे डायजेशन और टॉक्सिन की सफाई में मदद मिलती है। मरीज का खाना बिल्कुल हल्का, गर्म और आसानी से पचने वाला होना चाहिए। इसके लिए चावल का दलिया, मूंग की दाल और सब्जियों का सूप ले सकते हैं। कोल्ड ड्रिंक्स, फ्राइड फूड, भारी खाना, अत्यधिक मसालों से बचना चाहिए, क्योंकि यह अग्नि को कमजोर और रिकवरी को टालने का काम करते हैं।

आयुर्वेद में फीवर को मैनेज करने के लिए नागरमोथा और परपटाका (पिटपापड़ा) जैसी पारंपरिक जड़ी-बूटियों को कारगर माना जाता है। इन हर्ब्स को अकेले या तुलसी, ताजे या सूखे अदरक, जीरा आदि के साथ उबालकर बनाया हुआ काढ़ा इंफ्लामेटरी हीट को कम करने में मदद करता है। जकड़न दूर करने के लिए स्टीम इनहेलेशन और इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए गुडुची यानी गिलोय का उपयोग किया जाता है।

कब लेनी चाहिए बुखार की दवा?
आयुर्वेद मानता है कि हल्के बुखार के अधिकतर मामलों को ठीक करने के लिए प्राकृतिक उपाय काफी रहते हैं, लेकिन कई बार दवा लेना भी जरूरी हो जाता है। हालांकि, बुखार की शुरुआत या हल्के बुखार में भारी दवाएं लेने से बचना चाहिए, क्योंकि इसकी वजह से शरीर की प्राकृतिक प्रतिक्रिया कम हो जाती है और अमा का मेटाबॉलिज्म प्रभावित हो जाता है। पाचन सुधरने के बाद जरूरी आयुर्वेदिक या मॉडर्न दवा का प्रभाव बेहतर होता है।

ज्यादा तकलीफ में पैरासिटामोल ले सकते हैं, लेकिन इसका अत्यधिक सेवन नहीं करना चाहिए। एंटीबायोटिक्स को कभी भी खुद नहीं लेना चाहिए, क्योंकि अधिकतर बुखार के पीछे वायरल इंफेक्शन होता है और ऐसे में एंटीबायोटिक्स का गैर-जरूरी उपयोग आंतों का स्वास्थ्य और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बिगाड़ सकता है।

ये लोग बरतें ज्यादा सावधानी
बच्चों, बुजुर्गों और डायबिटीज-हाई बीपी जैसी क्रोनिक बीमारी के मरीजों को ज्यादा सावधानी की जरूरत होती है। क्योंकि इनमें डिहाइड्रेशन से होने वाले गंभीर परिणामों को ज्यादा खतरा रहता है। इन लोगों में हल्का बुखार भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। अगर बच्चों व बुजुर्गों का बॉडी टेंप्रेचर 100°F से ज्यादा हो तो तुरंत मेडिकल एडवाइस लेनी चाहिए और गीली पट्टी, हाइड्रेशन आदि से तापमान को कंट्रोल करने की कोशिश करनी चाहिए।

अगर बुखार के साथ सांस लेने में तकलीफ, लगातार उल्टी, डायरिया, कंफ्यूजन, गंभीर सिरदर्द, ठंड लगना या असामान्य कमजोरी-थकान हो तो तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए। जल्दी टेस्टिंग की मदद से डेंगू फीवर, मलेरिया या टाइफाइड को पकड़कर ठीक किया जा सकता है।

आयुर्वेद कहता है कि स्वास्थ्य और जीवन को संतुलित रखने के लिए आहार, नींद और शारीरिक गतिविधि को स्वस्थ रखना बहुत जरूरी है। बैलेंस्ड डाइट लेने से शरीर को पोषण मिलता है और अग्नि सही रहती है। पर्याप्त नींद लेने से इम्यूनिटी और एनर्जी का लेवल सही रहता है। नियमित एक्सरसाइज व योगा से मेटाबॉलिक बैलेंस, सर्कुलेशन और सहनशक्ति बनी रहती है। साथ में स्ट्रेस मैनेजमेंट और सीजनल रूटीन के साथ डायजेशन व इम्यूनिटी सुधारी जा सकती है।