धूप, धूल और विकास का दबाव, दिल्ली के पेड़ों पर खतरे की घंटी, हरियाली बचाने की बड़ी चुनौती!

PARMODKUMAR

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नई दिल्ली: दिल्ली में गर्मी अपने चरम पर नहीं पहुंची है, लेकिन इसका खयाल आते ही माथे पर पसीना आ जाता है। अगर आप मई-जून की तपती दोपहर में चाणक्यपुरी, सरदार पटेल मार्ग, सरिता विहार, लोधी गार्डन आदि इलाकों से गुजरें, तो लगेगा सड़कों पर पेंटिंग देख रहे हैं। अमलतास के पेड़ों की कतारों पर झूलते पीले फूल ऐसे लगते हैं, मानो धूप का टुकड़ा जमीन पर आ गया हो।

सदियों पुरानी कहानी: दिल्ली के पेड़ों की खूबसूरती के पीछे सदियों पुरानी कहानी है। आज जब सरकार पेड़ों की गिनती करने जा रही है, तब समझना जरूरी है कि ये पेड़ हमारे लिए क्या मायने रखते हैं। इस प्रॉजेक्ट के तहत अगले चार बरसों में दिल्ली के हर गैर-वन पेड़ को गिना जाएगा और टैगिंग कर उनकी हालत जानी जाएगी। भले ही यह सरकारी प्रक्रिया लगे, पर दिल्ली की हरियाली बचाने की अहम कोशिश है।

गार्डन सिटी: एडविन लुटियंस ने दिल्ली को गार्डन सिटी के तौर पर डिजाइन किया। इंडिया गेट के पास जामुन के पेड़, सफदरजंग रोड पर नीम और अमृता शेरगिल मार्ग पर अमलतास के पेड़ लगाए गए। तब से ही दिल्ली अपने पेड़ों की वजह से पहचानी जाती है। इसके अलावा, अलग-अलग हिस्सों में पेड़ों का रंग भी बदलता है। लोधी गार्डन, नेहरू पार्क और संजय लेक जैसे पार्कों में गुलमोहर के फूल शोलों जैसे चमकते हैं।
संकट गहरा रहा: अब तेजी से हो रहे शहरी विकास के कारण हजारों पेड़ उजड़ गए हैं। मेट्रो बनाने के दौरान बड़ी संख्या में पेड़ काट दिए गए। सरोजिनी नगर, नौरोजी नगर, नेताजी नगर जैसे इलाकों में पुराने पेड़ हटाए गए। समस्या सिर्फ पेड़ों की संख्या की नहीं, बल्कि उन पर आशियाना बनाने वाले परिंदों की भी है। देश की राजधानी में तोते, उल्लू और अन्य पक्षियों के लिए जगह कम पड़ रही है। प्रदूषण और गगनचुंबी इमारतों ने उनका जीवन मुश्किल बना दिया है।
उम्मीद जिंदा है: कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क, बुद्ध जयंती पार्क में अब भी हरियाली बची है। यहां के पेड़ जिंदगी को सहारा दे रहे हैं। हालांकि, वे भी तूफान, प्रदूषण और पानी की कमी जैसी मार झेल रहे हैं। इसलिए दिल्ली में पेड़ों की गणना जरूरी है। इससे पेड़ों के संरक्षण के लिए बेहतर योजना भी बन सकेगी।