शुगर के मरीजों के लिए क्यों खतरनाक है डायबिटिक कीटोएसिडोसिस? कौन-से लक्षण देते हैं चेतावनी?

parmodkumar

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डायबिटिक कीटोएसिडोसिस की स्थिति जानलेवा हो सकती है। पर्याप्त इंसुलिन नहीं होने पर शरीर कीटोन्स बनाता है, जो खून को एसिडिक बना देते हैं। इस कंडीशन को डायबिटीज के गंभीर परिणामों के रूप में देखा जाता है। क्लीवलैंड क्लीनिक के अनुसार, इसकी वजह से दिमाग में सूजन, फेफड़ों में पानी भरना, कार्डियक अरेस्ट, किडनी डैमेज जैसी खतरनाक स्थिति बन सकती है। इसलिए हर किसी को डायबिटिक कीटोएसिडोसिस के संकेत और कारण के बारे में पता होना चाहिए।

इंसुलिन की जरूरत क्यों?
इंसुलिन एक आवश्यक हॉर्मोन है, जिसे पैंक्रियाज बनाता है। क्लीवलैंड क्लीनिक के अनुसार, यह हॉर्मोन कार्बोहाइड्रेट्स से ब्लड में पहुंचने वाली ग्लूकोज को सेल्स के अंदर जाने में मदद करता है। फिर कोशिकाएं एनर्जी के रूप में इसका इस्तेमाल करती हैं। अगर शरीर में इंसुलिन की कमी हो जाए या बॉडी इसका इस्तेमाल ना कर पाए तो खून में शुगर बढ़ने लगती है, जिससे डायबिटीज बनती है। ग्लूकोज ना मिलने पर शरीर पहले से स्टोर किए हुए फैट को तोड़कर एनर्जी बनाता है।

फैट टूटने पर बनते हैं कीटोन्स
क्लीवलैंड क्लीनिक के अनुसार, जब ऊर्जा बनाने के लिए शरीर पहले से स्टोर किए हुए फैट को तोड़ता है तो कीटोन्स बनते हैं, जिसका उत्पादन लिवर करता है। यह एसिड होते हैं, जो खून के द्वारा शरीर के हर टिश्यू तक पहुंचकर उसे एनर्जी देते हैं। अपना काम करने के बाद कीटोन्स पेशाब के रास्ते बाहर निकल जाते हैं। ब्लड में कीटोन्स की कुछ मात्रा होना नॉर्मल है, लेकिन बहुत अत्यधिक होना खतरनाक होता है।

खून में क्यों जरूरत से ज्यादा बढ़ जाते हैं कीटोन्स?
जब इंसुलिन हॉर्मोन का उत्पादन इतना कम हो जाता है कि ग्लूकोज का बिल्कुल इस्तेमाल ना हो पाए तो शरीर एनर्जी के लिए ज्यादा मात्रा में फैट का इस्तेमाल करता है। सीडीसी के मुताबिक, इससे कम समय में ज्यादा कीटोन्स बनते हैं, जो खून में पहुंचते हैं। एसिडिक कीटोन्स की ज्यादा मात्रा ब्लड को भी एसिडिक बना देती है। इस स्थिति को ही डायबिटिक कीटोएसिडोसिस कहा जाता है।

टाइप 1 डायबिटीज के मरीजों को ज्यादा खतरा
सीडीसी बताता है कि डायबिटिक कीटोएसिडोसिस टाइप 1 डायबिटीज के मरीजों में आम है। हालांकि, यह टाइप 2 डायबिटीज के मरीजों को भी शिकार बना सकती है। टाइप 1 मधुमेह एक क्रॉनिक ऑटोइम्यून डिसऑर्डर है, जिसमें इम्यून सिस्टम इंसुलिन बनाने वाली पैंक्रियाटिक सेल्स को नष्ट करने लगता है। इसकी वजह से इंसुलिन का उत्पादन बेहद कम से लेकर ना के बराबर हो सकता है और डायबिटिक कीटोएसिडोसिस विकसित हो जाती है।

टाइप 2 डायबिटीज में कितना खतरा?
टाइप 2 डायबिटीज के मामलों में डायबिटिक कीटोएसिडोसिस की जगह हाइपरोस्मोलर हाइपरग्लाइसेमिक स्टेट (HHS) की स्थिति ज्यादा देखी जाती है। एचएचएस का विकास भी इंसुलिन की कमी से होता है, लेकिन फिर भी इस स्थिति में एनर्जी बनाने लायक इंसुलिन बनाने में शरीर सक्षम होता है। यह भी एक जानलेवा स्थिति है। जब टाइप 2 डायबिटीज में एनर्जी के लिए पर्याप्त इंसुलिन नहीं बन पाएगा तब डायबिटिक कीटोएसिडोसिस की स्थिति आएगी।

डायबिटिक कीटोएसिडोसिस का खतरा बढ़ाने वाले कारण
मरीज में टाइप 1 डायबिटीज का निदान ना होना
इंसुलिन शॉट मिस हो जाना
इंसुलिन की गलत डोज लेना
इंसुलिन पंप का बंद होना
किसी बीमारी के कारण खाना-पीना बंद हो जाना
कुछ दवाओं का साइड इफेक्ट होना
हार्ट अटैक या स्ट्रोक होना
एक्सीडेंट से शारीरिक चोट लगना
शराब की लत

डायबिटिक कीटोएसिडोसिस के संकेत
अमेरिकन डायबिटीज एसोसिएशन के मुताबिक डायबिटिक कीटोएसिडोसिस धीरे-धीरे विकसित होती है, जिसकी वजह से निम्नलिखित लक्षण दिख सकते हैं या और गंभीर हो सकते हैं।

बहुत ज्यादा प्यास लगना
बहुत ज्यादा पेशाब आना
तेज और गहरी सांस लेना
मुंह और स्किन में रूखापन
फ्लश्ड फेस
मुंह से बदबू आना
सिरदर्द
मांसपेशियों में दर्द व अकड़न
बहुत ज्यादा थकान रहना
पेट दर्द और जी मिचलाना, आदि

मरीजों को क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
सीडीसी कहता है कि इस जानलेवा स्थिति से बचने के लिए आपको कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए। जैसे-

अक्सर ब्लड शुगर की जांच करते रहना चाहिए। अगर आप बीमार हैं तो खासतौर से यह काम करें।
हमेशा ब्लड शुगर को नॉर्मल लेवल के अंदर रखें।
डायबिटीज की दवाओं को कभी मिस ना करें।
इंसुलिन शॉट कभी मिस ना करें और डोज में खुद से फेरबदल ना करें।
इंसुलिन लेने वाले लोगों को अपने खानपान की पूरी जानकारी डॉक्टर को देनी चाहिए और उसकी सलाह माननी चाहिए।
डायबिटीज में यूरीन टेस्ट जरूर करवाते रहें। अगर कीटोन्स की मात्रा ज्यादा आए तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।